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‘अर्थतंत्र’ के साथ आगे बढ़ता सरकारी ‘त्यौहार’ प्रबल विशेष 

 


छत्तीसगढ़ में चुनावी साल प्रारंभ हो चुका है। लगभग 11 महीने के अंदर ही यहां मतदान होंगे। मतदान के लगभग डेढ़ महीने पहले आचार संहिता लग जाएगी। ऐसे में सरकार के पास काम करने के लिए केवल नौ महीने ही शेष बचे हैं। यही कारण है कि किसानों को बोनस, तेंदूपत्ता तिहार, मोबाइल वाले बाबा के बाद अब ई-जनदर्शन शुरु किया गया है। मार्च के बजट में मुख्यमंत्री कोई न कोई उपहार अवश्य दे देंगे। साल में एक ही बार चलने वाले लोक सुराज का स्वरुप भी इस वर्ष से बदल दिया गया है। मुख्यमंत्री की मंशा पर कभी किसी को कदाचित ही संदेह रहा हो। ऐसे में ये सारी घोषणाएं या काम की रुपरेखा नि:संदेह विचार करके ही बनी होगी। किंतु धरातल पर इन योजनाओं की सच्चाई क्या है? रमन सिंह घोषणा करके आगे बढ़ जाते हैं। प्रशासन में बैठे पांच प्रमुख अफसर मुख्यमंत्री को प्रसन्न करने के साथ सारा गुणा-भाग करने में व्यस्त हो जाते हैं। बस सिस्टम में बैठे ेलोग फिर अपना खेल खेलने में लग जाते हैं। इस बात को समझाने के लिए आगे-पीछे जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। वर्तमान में चल रही धान खरीदी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। छत्तीसगढ़ के किसान अपना धान लेकर सोसायटियों में भटक रहे हैं। इनके धान में कोई न कोई समस्या निकल ही आती है। किंतु दूसरे राज्यों से आ रहे धान तत्काल ही खरीद लिए जाते हैं। ऐसे राज्यों के किसानों को बोनस के लिए जो खेल चल रहा है, क्या उससे आला अफसर अनभिज्ञ हैं? बात वर्तमान बल्कि आज की ही एक योजना की भी कर लेते हैं। आज ई-जनदर्शन का प्रारंभ हुआ है। ये एक तरह से संवाद स्थापित करने के लिए ठीक योजना है। किंतु जब प्रत्यक्ष रुप से सीएम जनदर्शन में विषय पूछकर लोगों को सीएम से मिलने दिया जाता हो, तब ई-जनदर्शन में आम लोगों की भागीदारी किस तरह से हो सकती है? आवेदनों के निराकरण के आंकड़े अगर कागजी न होते तो क्यों सालों से सीएम या कलेक्टर जनदर्शन में व्यक्ति विशेष को चक्कर काटना पड़ता? इसमे कोई संदेह नहीं कि सारी योजनाएं पवित्र मन से बनाई जाती है किंतु जब उसके पालन करने की बारी आती है तब हित-अहित प्रभावित होने लगता है। सिस्टम से जुड़े लोगों के द्वारा ‘कमीशनखोरी’ की जाती है। अपना-पराया देखा जाता है। ढेरों ऐसे गांव हैं, जहां सरकार की योजनाओं को पूरी तरह से इसलिए नहीं पहुंचने दिया जाता कि उन गांवों से भाजपा को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। नि:संदेह ये काम सरकार का तो हो नहीं सकता। पार्टी और प्रशासन के स्तर पर ऐसे कार्य किये जाते हैं। चुनावी साल में इन सभी का हिसाब होता है। राजिम के ‘पांचवे कुंभ’ की तरह स्वघोषित सरकारी त्यौहारों की सच्चाई भी यही है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ उन गांवों तक लाभ पहुंचाया जाए, जहां से पार्टी को सफलता की संभावनाएं दिखती है। गुणा-भाग का ये खेल हर सरकार में चलता है। वास्तव में सरकार की योजनाओं का इप्लीमेंट पार्टी ही करवाती है। और जहां राजनीतिक दल किसी योजना का इंप्लीमेंट करवाए, वहां गुणा-भाग, लाभ-हानि, कमीशनखोरी की संभावनाएं सर्वाधिक होती ही है। इन सारी विसंगतियों को रोकने के लिए ही विपक्ष की अवधारणाएं रची गई थी। किंतु विपक्ष के नेता स्वहित में ही मस्त हैं। ऐसे में भाजपा के पास चौथी बार सरकार बनाने की संभावनाएं स्वत: ही प्रबल हो जा रही है। चुनावी साल में भी कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी के अंतविरोध को रोकने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। परिणाम के पूर्व तक परिणाम की सुखद कल्पना करने से भला कौन किसको रोक सकता है? इसी तर्ज पर कांग्रेस छत्तीसगढ़ में भाजपा का विजय रथ रोकने की कल्पना कर रही है। किंतु कांग्रेस की ये कल्पना धरातल पर बहुत मजबूत है, या केवल मजबूत होने का इन्हें भान हो रहा है, इसकी सच्चाई पार्टी के दूसरी पंक्ति के नेता बहुत अच्छे से जानते हैं। कांग्रेस की तुलना में भाजपा के नेता अधिक अनुशासित हैं। प्रथम पंक्ति के नेता तो मुख्यमंत्री-मंत्री बनने की जुगत में पहले से ही लगे हैं। दूसरी पंक्ति के नेता पार्टी को मजबूत करने का काम करते रहते हैं। क्योंकि इन्हें पता है कि सरकार आएगी तभी कोई ठेकेदार बन पाएगा। तो कोई सरकारी कामकाज में अपना हस्ताक्षेप रख पाएगा। अर्थतंत्र की महिमा भाजपा में सर्वाधिक है। कदाचित पार्टी के रणनीतिकारों ने पार्टी कार्यकर्ताओं की इसी सोच को बहुत अच्छे से समझ लिया है। यही कारण है कि चुनावी साल में योजनाओं का इंप्लीमेंट ‘त्यौहारों’ के रुप में हो रहा है।

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