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शराबखोरी के लिए क्या अकेली दोषी है सरकार?

 

  
24 अरब 22 करोड़ 43 लाख 47 हजार 888 रुपए! क्या आप जानते हैं कि ये राशि कैसी है? चलिए आपको बताते हैं कि ये राशि किसकी है! ये राशि किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है! या राशि केवल आठ महीने की कमाई की है! सरकार के आबकारी विभाग ने इसे केवल आठ महीने में ही कमाया है। नए वित्तिय वर्ष से लेकर पिछले महीने तक की कुल 8 महीने की अवधि में ये कमाई की गई है। अभी चार महीने शेष हैं। नि:संदेह ये कहा जा सकता है कि बचे चार महीने में कमाई का ये आंकड़ा 30 अरब के पार हो जाएगा। अगर सरकार ने थोड़ा प्रयासस किया तो बहुत संभव है कि बचे चार महीने मेंं ही कमाई 34-35 अरब से उपर तक बैठ जाए! यानि 35 सौ करोड़ तक की कमाई की जा सकती है। सरकार के तमाम विभागों से मिलने वाले राजस्व के आंकड़ों में आबकारी विभाग का प्रथम पांच में स्थान है। ऐसे में सरकार के लिए ये सर्वाधिक महत्वपूर्ण विभागों में से एक है। कमाई के इस पैसों से सरकार की योजनाओं को आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है। किसी भी सरकार के लिए इस तरह की बड़ी कमाई का मोह छोड़ पाना सरल नहीं है! फिर बात अकेले कमाई की ही नहीं है! शराबबंदी के अपने ढेरों नुकसान हैं। जो शराब अवैध रुप से बिकती हैं, उसकी गुणवत्ता भगवान भरोसे होती है। उपर से अधिक कमाई के फेर में शराब में जो मिश्रण मिलाया जाता है, उसके कारण वो विष का रुप ले लेती हैं। जिन राज्यों में शराबबंदी है, वैसे राज्यों से जहरीली शराब पीकर लोगों के मरने के समाचार भी आते रहते हैं। उस हिसाब से छत्तीसगढ़ सरकार का शराब बेचने का कदम आलोचनाओं का विषय तो बन सकता है, पर इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता। नए वित्तिय वर्ष के पूर्व राज्य सरकार पर भी शराबबंदी को लेकर खासा दबाव था। विपक्ष के साथ जनसमूहों के अतिरिक्त स्वयं सरकार के भीतर बैठे ढेरों लोग शराबबंदी के पक्ष में थे। पर सरकार ने तमाम परिस्थितियों को देखते हुए खुद ही शराब बेचने का निर्णय लिया। शराब दुकानों के सरकारी करण को लेकर सरकार के पास तर्क हैं कि इससे कोचियों पर नियंत्रण लगेगा। पर छत्तीसगढ़ में ऐसा कही से भी नहीं दिखता है। गांवों में आज भी शराब की बिक्री हो रही है। सरकारी शराब दुकानों से ही इन्हें शराबों की आपूर्ति हो रही है। सरकारी करण के कारण यहां केवल वो ही ब्रांड बिकने चाहिए, जिन्हें बेचने की अनुमति सरकार देती है। पर दूसरे राज्यों के ढेरों ब्रांड यहां चोरी-छिपे बिक रहे हैं। सरकार का आबकारी विभाग उन पर रोक लगाने की अपेक्षा उन्हें प्रश्रय देते हुए दिखता है! खैर, यहां बात कमाई की हो रही है तो ये बताना आवश्यक है कि सदन मेंं विभागीय मंत्री ने जिलेवार जो आंकड़े प्रस्तुत किए उसमे रायपुर जिला अग्रणी है। यहां के 40 लाख 63 हजार की आबादी वालों में से जो लोग शराब का सेवन करते हैं, उन्होंने खूब छककर पीया। इन आठ महीनों में लगभग 4 अरब यानि चार सौ करोड़ की शराब इस जिले के लोग डकार गए। अगर लोगों के शराब पीने में भी सरकार का ही दोष माना जाता है तो हमे इस दृष्टिकोण पर विचार करने ककी आवश्यकता है। शराबखोरी को लेकर न्यून आय वर्ग के लोगों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। जबकि वास्तविकता ये भी है कि बड़ी संख्या में मध्यम और उच्चवर्ग के लोग भी शराब का सेवन नियमिमतत रुप से करते हैं। ऐसे में ये कहना उपयुक्त नहीं है कि सरकार की योजनाओं से मिलने वाली कमाई का लोग शराब खरीदने में उपयोग कर रहे हैं! किंतु जिस तरह से शराब से होने वाली कमाई के आंकड़ों में विस्तार होते जा रहा है, उसे देखते हुए सरकार को अपने प्रयासों पर विचार अवश्य करना चााहिए। उपलब्धता आखिर सरकार या सरकार की इच्छा से ही हो रहा है। ऐसे में जब कमाई को ही आधार बनाया जाएगा तब सरकार को ये भी देखना होगा कि कमाई का बड़ा हिस्सा किस तरह से उन बीमारियों पर खर्च किया जा रहा है जो बीमारियां शराब के नियमित सेवन से होती है!

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