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मदमस्त चंद्राकर पर सरकार का कोई लगाम नहीं! 

प्रबल विशेष
कुछ माह पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपनी बहु का प्रसव अंबेडकर अस्पताल में कराया था। संकेत दिया गया कि प्रदेश की सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था एकदुम दुरुस्त है। सीएम की बहु के प्रसव के बाद कुछ पत्रकारों ने अस्पताल के प्रसूति वार्ड का स्टिंग आपरेशन किया था। इसमे ये पाया गया कि एक ही बिस्तर पर दो-दो प्रसूताओं को लिटाकर रखा गया है। कदाचित सीएम की बहु के मामले में पूरा अस्पताल प्रशासन हाथ बांध कर खड़ा रहा हो, पर बाकी समय में वहां के आम मरीजों को ये भेड़-बकरी से अधिक कुछ नहीं समझते हैं। कल ही 'प्रबल पहल' ने भी आपको अंबेडकर की तस्वीर दिखाई थी। किस तरह से डिलवरी के बाद दो-दो महिलाओं को एक ही बिस्तर पर सुलाने के लिए विवश किया गया था। वही उनके नवजात को इस भीषण ठंड में भी परिजनों के साथ नीचे सोना पड़ रहा था। ये तस्वीर अब कॉमन है। इधर, आज ही ये समाचार निकलकर आया कि अंबेडकर अस्पताल के शिशु वार्ड के आईसीयू में एक के बाद एक कर कुल 6 बच्चों की मौत हो गई। एक ही रात में 6 बच्चों की मौत!!! कहां था अस्पताल का पूरा प्रशासन? कहा थे शिशु रोग विभाग का स्टॉफ ? कहां था यहां तैनात रहने वाला डॉक्टर? सब के सब अपनी चाल में मस्त! जिनके बच्चे मरे, उनकी औकात इस सिस्टम में कुछ भी नहीं होगी। अन्यथा अंबेडकर के अधीक्षक से लेकर तमाम डॉक्टर उन बच्चों के उपचार के लिए हाथ बांधे खड़े होते! कुछ महीने पहले ही आक्सीजन सप्लाई रुकने के कारण 4 बच्चों की मौत इसी अस्पताल में हुई थी। क्या हुआ उस जांच का? आपरेटर को बलि का बकरा बनाकर मामले को निपटा दिया गया। वास्तव में ऐसा हाल अकेले अंबेडकर अस्पताल का नहीं है। प्रदेश की पूरी की पूरी सरकारी व्यवस्था खैराती बन गई है। इससे पहले स्वास्थ्य मंत्री के रुप में अमर अग्रवाल ने जो तीर मारे थे। अब उसी पद पर बैठकर अजय चंद्राकर भी वही कर रहे हैं। कभी ऐसी कोई घटना हुई तो एकाध मीटिंग ले लेते हैं। एकाध बयान जारी कर देते हैं। उसके बाद पूरा का पूरा सिस्टम उसी ढर्रे पर चलने लगता है। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के प्रवक्ता नितीन भंसाली ने तो राज्य सरकार को ही चुनौती दे दी है कि केवल चार दिनों के लिए उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बना दिया जाए, वो पूरी की पूरी व्यवस्था ठीक कर देंगे। वास्तव में ऐसा हो भी सकता है। इसके लिए इच्छाशक्ति और काम करने का जज्बा चाहिए होता है। पर छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य है कि यहां के स्वास्थ्य मंत्री मदमस्त ही रहे हैं। वास्तव में ऐसे लोग मंत्री क्या पंच या पार्षद बनने की योग्यता नहीं रखते हैं। किंतु सरकार इन्हें ऐसा दायित्व दे देती है, तो जनता के पास केवल रोने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचता है। बात स्वास्थ्य मंत्री की निकली है तो बताते चलें कि गरियाबंद के सूपाबेड़ा में दूषित जल के कारण 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। बावजूद मंत्रीजी को बयानों के तीर छोडऩे से ही समय नहीं मिलता है। स्वास्थ्य मंत्री के रुप में इनके नकारेपन को जब जनता स्वम देख लेती है तब सरकार में बैठे लोगों को ये सब क्यों नहीं दिखता? सरकार को नहीं दिखता, ये बात तो फिर भी समझी जा सकती है किंतु पार्टी को तो ये सब द्रिखता ही होगा। अभी चुनावी साल है। क्या स्वास्थ्य विभाग की इन्हीं करतूतों को जनता के सामने जाकर प्रस्तुत करेंगे भाजपा कार्यकर्ता? वास्तव में पार्टी के वरिष्ठ लोग भी चंद्राकर के कामों को लेकर अप्रसन्नता व्यक्त कर चुके हैं। सरकार तक को इसकी जानकारी है, पर हाईकमान मौन है। वहां से कोई दिशा-निर्देश नहीं आया! ऐसे में रमन सिंह अपनी इच्छा से कैसे इतने सशक्त मंत्री के विरुद्ध कोई कार्रवाई कर सकते हैं। कुछ माह पूर्व ही जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह रायपुर आए थे, तब उन्होंने एक दिन के कार्यक्रम में दो-दो बार चंद्राकर को डाटा था। बावजूद चंद्राकर उनके सामीप्य का कोई भी अवसर छोडऩे के लिए तैयार नहीं थे। जितना समर्पण चंद्राकर अमित शाह के प्रति दिखा रहे थे, उतना ही समर्पण अगर वो छत्तीसगढ़ के गरीब लोगों के प्रति दिखाते तो आज उनके संबंध में पार्टी कार्यकर्ताओं सहित आम लोगों के द्वारा बोले जाने वाली बातों की दिशा ही बदल चुकी होती। खैर, हम यहां कुछ विपक्ष के संबंध में भी लिखना चाहते थे। किंतु प्रदेश के मुखिया का सालों पहले कहा गया एक डायलाग स्मरण हो रहा है-ऐसा विपक्ष है तो हमे कोई मेहनत करने की आवश्यकता ही नहीं है!!

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