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'प्रबल विशेष' की दो टिप्पणियों पर सदन में हुई चर्चा ...

अविश्वास प्रस्ताव ध्वस्त होना ही था! बिना संख्या बल के इस पर जो संभव हो सकता था, वो करने का प्रयास कांग्रेस ने किया। किंतु भाजपा ने भी सरेंडर नहीं किया। जीत सुनिश्चित होने के बाद भी भाजपा ने किसी विजेता सा नहीं, अपितु योद्धा सा प्रहार किया। सरकार के मंत्रियों ने खुलकर प्रहार किया। स्थिति यहां तक रही कि सदन के ठीक भीतर अपनी ही पोल-पट्टी खोलने में भाजपा के मंत्रियों ने कोई कोताही नहीं की। एक मंत्री ने तो सदन के भीतर ही यहां तक कह दिया कि-नेता प्रतिपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाने का यह कदम इसलिए उठाया ताकि कोई उन्हें 14 वां मंत्री न कहें 19 दिसंबर के अपने इसी कॉलम में हमने इस '14 वें मंत्री का उल्लेख किया था। यहां नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव '14 वें मंत्री हैं या कोई और भी इस अघोषित दायित्व का निर्वहन कर रहा है, ये तो जनता भली-भांति जानती है, पर अब चुनावी साल में '14 वें मंत्री को लेकर अवश्य बहस छिड़ गई है। छत्तीसगढ़ की पहली निर्वाचित विधानसभा में दिवंगत महेंद्र कर्मा नेता प्रतिपक्ष बने थे। उन्हीं की अगुवाई में राज्य में नक्सलियों के कथित विरोध में सलवा जुडूम शुरु किया गया था। हालांकि बाद में अदालत ने सलवा जुडूम को ये कहकर बंद करवाया कि इससे जुड़े लोगों के द्वारा संगठित गिरोह की तरह व्यवहार किया जा रहा है! सलवा जुडूम की पृष्ठभूमि के पीछे बस्तर में टाटा के प्लांट को बताया जा रहा है। घोषित रुप से इसे नक्सलियों के विरुद्ध चलाया गया जनअभियान का नाम दे दिया गया किंतु जानकार बताते हैं कि इसकी आड़ में उन सभी गांवों को खाली कराने का प्रयास किया जाने लगा था जहां टाटा के प्लांट के लिए जमीन चाहिए थी! सरकार ने इस अभियान को अपना पूरा संरक्षण दिया। पर सब कुछ अघोषित रुप से! यश और अपयश दिवंगत कर्मा के खाते में डाले गए!!! कर्मा ने भी कभी खुलकर इनका विरोध नहीं किया। स्वत: ही ये संदेश गया कि कर्मा सरकार के '14 वें मंत्री के जैसा व्यवहार करने लगे हैं। अंतत: साल-2008 के चुनाव में कर्मा की पराजय हुई। महेंद्र कर्मा ही क्यों, कहने वाले अजीत जोगी, रविंद्र चौबे, चरणदास महंत जैसे नेताओं को भी अघोषित मंत्री का ही दर्जा देते आए हैं। हाल के कुछ समय में सरकार के विरुद्ध आक्रामक रहे पीसीसी प्रमुख के संबंध में भी यही कहा जाने लगा है! खुद कांग्रेसी ही ये ढंके-छिपे तरीके से कहने लगे हैं कि भूपेश के तरीके बस अलग हैं। बाकि पूरा काम उसी '14 वें मंत्री जैसा ही है! इस '14 वें मंत्री की परिभाषा से परे एक अन्य विषय जिसे हमने अपने कॉलम में स्थान दिया था, उसे लेकर भी अविश्वास प्रस्ताव के दौरान काफी गर्मा-गर्मी हुई। स्वर्गीय नंदकुमार पटेल के बेटे और विधायक उमेश पटेल ने ठीक उन्हीं बातों का उल्लेख किया, जिसे 'प्रबल विशेष के 22 दिसंबर के अपने अंक में हमने 'क्या झीरम से बच जाना कवासी का अपराध है...? नामक शीर्षक से प्रकाशित किया था। इस समाचार पत्र के प्रकाशन के बाद सदन में इस विषय पर गहरी चर्चा हुई। उमेश ने ये भी कहा कि आखिर ऐसा कौन सा सच है, जिसे लेकर समय-समय पर प्रभावशील लोगों के द्वारा टिप्पणियां की जाती हैं, और जिसे जांच एजेंसियां तक नहीं उगलवा पाई? उमेश के प्रश्न पर मुख्यमंत्री भावुक हुए। उन्होंने पूरे घटनाक्रम का उल्लेख कर दिया। अपने योगदान को रेखांकित करते हुए रमन सिंह ने कहा कि एक मुख्यमंत्री के रुप में इस घटना की तह तक जाने के लिए वो जो कर सकते थे, उन्होंने किया। पर ये पूरा प्रश्न मुख्यमंत्री के ही द्वारा कवासी लखमा पर की गई टिप्पणी से शुरु हुआ था।

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