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17 वर्षों में कितना बदल गया रायपुर! 

 

बीते 17 वर्षो में रायपुर शहर कितना बदल गया!  17 साल पहले ये शहर कस्बे के रुप में था। गलियां छोटी थीं। मुख्य मार्ग की भी सड़कें 10-15 फीट से अधिक की नहीं थी। सड़क से कही अधिक स्थान तो कच्चे फुटपाथ की थी। ढेर सारे तालाब थे। कुंए की संस्कृति लोगों के जीवन का आधार थी। छोटी-छोटी बस्तियां थीं। कॉलोनियों का विस्तार न के बराबर था। न वाहनों का शोरगुल था। न ही इनसे होने वाला प्रदूषण। ये रायपुर शहर की अप्रतीम यादें थी। इन 17 वर्षो में कितना कुछ बदल गया! सड़कें चौड़ी हो गई। बड़ी-बड़ी विशाल कॉलोनियां तन गई। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बन गई। बाग-बगीचों, तालाबों को ढेरों काम्पलेक्स ने लील लिया। कुएं पाटकर वहां एक कमरा खड़ा कर दिया गया। आज इस शहर में हर व्यक्ति के पास गाड़ी हो गई। कभी दस फीट तक की चौड़ाई वाली सड़कें आज 60 फीट से अधिक चौड़ी होने के बाद भी 'टे्रफिक जामÓ की समस्या से घिर गई। विकास के नाम पर ढेरों मकान तोड़े गए। सैकड़ों बस्तियां उजाड़ दी गई। आज जब बीते 17 सालों में रायपुर का मूल्यांकन किया जाता है तो ये कहा जाता है कि नवोदित राज्य ने अपने समकक्ष राज्यों से कही अधिक विकास किया है। विकास का पैमाना आधुनिक है। इस लिहाज से ये माना जा सकता है कि जो कहा जा रहा है, वो सच ही कहा जा रहा है! किंतु इसे नैतिकता के पैमाने पर परख देखें तो लगता है कि ये विकास नहीं हो सकता!!! बीते 17 सालों से असंख्य वृक्षों को विकास की भेट चढ़ा दिया गया है। जिन सड़कों पर भरी गर्मी में भी राहत मिल जाया करती थी, आज वो सड़कें धूल-प्रदूषण ही दे पा रही हैं। अपनापन की भावनाएं, आज समाप्त होते दिख रही हैं। जिस शहर में छोटी सी बात पर पूरा शहर इक_ा हो जाता था, आज बड़ी-बड़ी घटनाओं पर भी ये शहर उद्धेलित नहीं होता! खैर, ये सारी बातें आज अर्थहीन हो चुकी हैं। इसलिए हम बात केवल वहीं करेंगे, जिनका विकास की दौड़ में कोई अर्थ निकलता है। इस 17 सालों में छत्तीसगढ़ ने दो ही पार्टी की सरकार देखी है। राजनीतिक स्थिरता को विकास का पर्याय्य मानकर यहां के लोगों ने बीते तीन चुनावों से एक ही पार्टी को सत्ता दिलाई है। पूरे छत्तीसगढ़ पर चर्चा फिर कभी होगी, किंतु अगर बात रायपुर की करें तो क्या आपको रायपुर राजधानी सा लगता है? रेलवे स्टेशन से लेकर डंगनिया, गौरवपथ से लेकर अब कलेक्टे्रट तक की दुकानों-मकानों को विकास की भेट चढ़ा दिया गया। यहां के नीतिकारों ने केवल ये ही माना कि विकास के लिए दुकानों-मकाों का तोड़ा जाना ही आवश्यक है। नई राजधानी बसा दी गई। कम से कम पुरानी राजधानी का स्वरुप तो ऐसा रखना चाहिए था, जिससे लोगों के राजधानी के रायपुर होने का भान सालों तक होता रहे! किंतु नहीं! यहां मंत्रियों का इंट्रेस्ट है! मंत्री के ठेकेदारों का इंर्टे्रस्ट है! इनके बिल्डर्स की रुचि है! चूंकि प्रजातंत्र में मंत्री भगवान सरीखे होते हैं और इन्हें अपने ठेकेदारों को उपकृत करना है। जमीनों के भाव आसमान पर पहुंचाना है तो विकास तो दिखाना ही होगा! ऐसे में जहां इच्छा करे, वहां तोडफ़ोड़ कर दो। थोड़ा अपनी स्मरणशक्ति पर जोर डालिए। रायपुर से बाहर की जमीन तो छोडि़ए, स्वयं रायपुर के बीच की ही जमीन आज से 15 साल पहले किस मूल्य पर बिका करती थीं? आज एक सामान्य व्यक्ति रायपुर से दस किमी तक की सीमा में जमीन का छोटा सा टुकड़ा खरीदने की स्थिति में नहीं है। जबकि मंत्रियों से जुड़े बिल्डर्स आज वहां पांच-पांच सौ एकड़ में कॉलोनियां बसा रहे हैं। एक-एक स्क्ेयर फीट का मूल्य हजार रुपए से शुरु हो रहा है। अपना घर बनाने के फेर में हर मध्यमवर्गीय बैंकों के लोग के कर्जे में डूबा हुआ है। उसे यही लग रहा है कि अगर अब नहीं ले पाए तो आगे कभी ले भी नहीं पाएंगे! और ये सच भी है। किंतु क्या शहर के लोगों ने कभी सोचा कि स्वयं की सोच के कारण ही आज सरकार और उसके तंत्र से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े लोग आपका खून चूस रहे हैं! नहीं! इसकी आवश्यकता भी क्या है? आज आक्सीजोन के नाम पर जिन 70 दुकानों को ढहा दिया गया, बीते दस सालों से वहां दुकानदार अपना धंधा जमा रहे ते। क्या कोई सोच सकता है कि अब नए स्थान पर इन्हें कितने सालों तक संघर्ष करना पड़ेगा? विकास के नाम पर हुए तोडफ़ोड़ को इस शहर के लोगों ने मूक बनकर देखा। ये सोचकर देखा कि जाने दो हमारा कौन सा टूट रहा है! बस, शहर के लोगों के यही मौन ने सरकार को शक्ति दी। परिस्थितियों को देखते हुए तैयार रहिए। इस 'विकासÓ का मूल्य मौन बैठे रहने वाले ढेरों लोगों को भी शीघ्र ही चुकाना पड़ सकता है!!!

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