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मैनपाट ही क्यों, छत्तीसगढ़ को बचाईए! 

प्रबल विशेष 

मैनपाट! ये वो स्थान है, जहां एक बार घूमकर आया कोई भी व्यक्ति दुबारा अवश्य जाना चाहेगा। इसे छत्तीसगढ़ का शिमला भी कहा जाता है। आज ही वहां का तापमान एक डिसे रिकार्ड किया गया है। बताया जा रहा है कि वहां बर्फ जमने लगी है और मौसम पूरी तरह पर्यटकों के अनुकूल बन गया है। वैसे यहां सर्दियों में ही नहीं, गर्मियों का भी मौसम पर्यटकों के अनुरुप ही रहता है। बारिश के दिनों में तो बादल लोगों को छूते हुए निकलते हैं। यहां घूमने के लिए भी ढेर सारे स्थान हैं। टाइगर पाइंट, मछली पाइंट, मेहता पाइंट है, जहां से आप प्राकृतिकों झरनों के साथ उगते सूर्य का अद्भुत दर्शन कर सकते हैं। मैनपाट में ही दलदली नामक एक स्थान हैं। जहां धरती हिलती है। बच्चों से लेकर बुजुर्गो को यहां जम्प कर धरती के हिलने का आननंद उठाते देखा जा सकता है। ढेरों खूबियों के बाद भी यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या गिनती की है। मैनपाट ही क्यों, बस्तर तो अपने आप में आज भी अबूझ है। छत्तीसगढ़ पर प्रकृति ने दोनो हाथों से अपना सर्वस्व लूटाया है। आप कभी भी चले जाईए, आपको प्रकृति की सौगातों का दर्शन अवश्य हो जाएंगे। किंतु राज्य बनने के बाद यहां बनने वाली सरकारों ने विशेष रुप से भाजपा सरकार ने कभी भी यहां प्रकृति अनुरुप विकास को आधार नहीं बनाया। केवल और केवल खनिज संसाधनों की लूट मचाई। स्थिति ये है कि राज्य के आधा दर्जन से अधिक शहर प्रदूषण की श्रेणी में विश्व या फिर देश में अपना भूमिका निभाने लगे हैं! रायपुर, कोरबा, जांजगीर-चांपा, रायगढ़ जैसे शहर कभी प्राकृतिक रुप से संपन्न हुआ करते थे। आज खनिज आधारित उद्योगों ने इन शहरों की पहचान ही बदलकर रख दी है। प्रदूषण के चलते आज इन शहरों में बसना अपने जीवन और स्वास्थ्य को जोखिम में डालने जैसा काम बन गया है! क्या आपने कभी सोचा कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? वास्तविक रुप से ये सब सरकार के संरक्षण में हो रहा है। सरकार ने कमाई के लिए केवल धरती के गर्भ को चीरने को ही एकमात्र आधार बनाकर रखा है। जंगल के जंगल साफ हो रहे हैं। धरती का सीना हजारों फीट गहरा खोद दिया जा रहा है। जहां वन्यप्राणियों की बेरोकटोक आवक होती थी, आज वहां केवल खदानों का गड्ढा और धूल उड़ाती हुई गाडिय़ां ही दिख रही हैं। इन सभी बातों का अर्थ ये है कि जो वन कभी छत्तीसगढ़ के लिए वरदान थे, सरकार की अदूरदर्शिता के कारण आज वो वही वन छत्तीसगढ़ के लिए अभिश्राप बनते जा रहे हैं। वास्तविक रुप से होना ये चाहिए था कि छत्तीसगढ़ का विकास वन, वनोपज और प्रकृति आधारित होना था। किंतु आज के इस दौर में सरकार के पास इतना संयम कहां बचा है? अत्याधुनिक उपकरणों की सहायता से जमीन के सैकड़ों फीट अंदर झांककर पता लगाया जा रहा है कि वहां कौन-कौन से खनिज संसाधन छिपे हुए हैं!!! स्थिति ऐसी है कि मानो सरकार ये मान रही है कि जमीन के अंदर जो भी छिपा है, उस पर केवल वर्तमान सरकार का ही अधिकार है! आने वाली पीढ़ी के लिए ये सरकार कुछ छोडऩा ही नहीं चाहती है!!! आज मैनपाट जैसे पर्यटन स्थलों की स्थिति देखिए! वहां चारों ओर से जंगल साफ होते जा रहे हैं। वहां धरती के गर्भ में छिपा बाक्साइट आज वहां के लिए कलंक बनते जा रहा है!!! बाक्साइट खनन के कारण मैनपाट की स्थिति आने वाले कुछ वर्षो में ऐसी भी नही ंरहेगी, जैसा हमने आपको प्रांरभ में बताया है। जो क्षेत्र वन्यप्राणियों के लिए सुरक्षित ठिकाना था, आज वो वहां से विस्थापित हो रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व जंगली हाथियों का दल राजधानी रायपुर के पास तक पहुंच गया था। सरकार की करनी का फल निर्दोष और बेजूबान जानवरों के साथ मानव को संघर्ष करके बिताना पड़ रहा है। हर साल सैकड़ों लोग हाथियों से कुचलकर मारे जा रहे हैं। हर साल हजारों हेक्टेयर की फसल हाथी बेकार कर दे रहे हैं। आखिर हम कब विचार करेंगे कि इस अत्याधुनिक विकास से हम प्राप्त क्या कर रहे हैं? क्यों हमने सरकार को खुली छूट दे दी है? क्या इस प्रदेश में विपक्ष नाम का कोई संगठन भी नहीं है? सब मौन हैं! इस मौन का दुष्परिणाम सामने आने के बाद भी सब मौन है!!! इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा? वास्तव में राज्य बनने का उद्देश्य ही खनिज संसाधनों की लूट समझ आता है। वरना जिस 17 साल में छत्तीसगढ़ प्राकृतिक रुप से जितना चौपट हुआ, स्थिति फिर वो नहीं होती! राज्य बनने के बाद किसी भी संगठन ने सरकार पर ये दबाव नहीं डाला कि यहां के विकास प्रकृति को हानि पहुंचाए बिना किए जाएं। लोगों के इस मौन से सरकार को बल मिला। परिणाम प्रत्यक्ष है। होना ये चाहिए था कि सरकार यहां वनोपज आधारित उद्योगों को बढ़ावा देती। वनोषधियों के संरक्षण और उनके संग्रहण पर काम करती। देश के साथ विदेशों की ढेरों एजेंसियां आज इस काम को करके अरबों का बिजनेस कर रही हैं। इसके अतिरिक्त पर्यटन को राजस्व का प्रमुख माध्यम बनाया जाता। आज काश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल जैसे राज्यों में केवल पर्यटन ही राजस्व का प्रमुख माध्यम है। क्या छत्तीसगढ़ इनमे से किसी से पीछे है? पर सरकार को त्वरित कमाई चाहिए। इस त्वरित कमाई के फेर में अब बातें सीमा पार करने लगी हैं! बस्तर नक्सलियों के हाथ में है। लोग कहते हैं कि इसीलिए बस्तर सुरक्षित है। परिस्थितियों को देखते हुए लोग ये भी कह रहे हैं कि आने वाले कुछ वर्षो में मैनपाट में भी रिकार्डतोड़ गर्मी पडऩे लगे तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए!

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