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रूढि़वादी परंपरा को तोड़, बेटी ने दी अपने पिता को मुखाग्नि

ललित राठोड़
रायपुर। एक वक्त था जब लडक़ी का श्मशान घाट पर पहुच जाना रूढि़वादी परंपरा माना जाता था, लडकीयों को उन सभी रीती-रिवाज से दूर रखा जाता था क्यों की पुरानी परम्परा है की अपने माता-पिता को मुखाग्नि केवल बेटा देता है न की लडक़ी!! पर अब वक्त बदल रहा है, और सोच भी बदल रही है साथ ही समाज का नजरिया बदल रहा है । जिस पिता ने अपनी बेटी को बेटे के सामान परवरिश दी हो उनके लिए उनकी बेटी ही बेटे के सामान है ।  जिला मुख्यालय से 30 की दुरी में स्थित खरोरा नगर पंचायत की यह घटना जब श्मशान पर उस समय सभी लोगों के आंसू छलक पड़े, जब एक बेटी ने श्मशान में रूढि़वादी परंपराओं के बंधन को तोड़ते हुए अपने पिता का अंतिम संस्कार किया । उस बेटी ने एक बेटा बनकर हर फर्ज को पूरा किया, जिसकी हर किसी ने तारीफ की अंतिम संस्कार में वह रोतीं रही, पापा को याद करती रही, लेकिन बेटे की कमी को हर तरह से पूरा किया । अंतिम संस्कार में पहुंचे लोगों ने कहा की एक पिता के लिए अंतिम विदाई इससे अच्छी और क्या हो सकती है, जब पुरानीं परंपरा को तोड़ते हुए बेटियों ने बेटे का फर्ज निभाया पहली बार परम्पराओं से हटकर एक बेटी ने अपने पिता को मुखाग्नि देकर उनका अंतिम संस्कार किया। मृतक का कोई बेटा नही था बल्कि दो बेटिया थी। दरअसल, ज्यादातर ऐसे होती की बेटा कुल का दीपक होता है। बेटे के बिना माता-पिता को मुखाग्नि कौन देगा? लेकिन अब यह बातें अब बीते ज़माने की ही गई है । यह शाबित हो गया की खरोरा की बेटी ने ऐसी पुरानी कुरीति एक बार फिर टूटी । बड़ी बेटी यशु शर्मा ने पिता को न सिर्फ मुखाग्नि दी बल्कि अंतिम संस्कार की हर वह रस्मे निभाई, जिनकी कल्पना कभी एक पुत्र से की जाती है। जानकारी के अनुसार नगर में ओमप्रकाश शर्मा का बीमारी के चलते निधन जो गया था। पिता की इच्छा थी की बेटी उनका अंतिम संस्कार करे और उनके पिता की आखरी इच्छा पूरी की। ओमप्रकाश की मृत्यु के बाद उनकी दोनों बेटियां ने हिन्दू रीती-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार के सारे फर्ज पुरे किए। 

बेटियां क्यों नही ..
आज जमाना बदल रहा है। पुरानी कुरीतियों रही है की दाह-संस्कार का कम केवल एक बेटा ही कर सकता है। लड़कियां नही ? लेकिन अब ऐसा नही है, जमाना बदल रहा है।  जो काम बेटे कर सकते है, उस काम को बेटियां भी कर सकती है । आज लडकियों का जमाना है, यह हर पैमाने में आगे बढ़ रही हैं। हमने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया और हम वह सभी कार्य करेगें, जो एक बेटे को करनी चाहिए । इसके बाद सभी रिश्तेदार ने एक राय होकर बेटी को ही अंतिम संस्कार के लिए आगे किया। 

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