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अस्पतालों का नाम ऐसा होना चाहिए...!

 

प्रबल विशेष 

रायपुर चौके के ओम हॉस्पीटल में मृत बच्चे को जिंदा बताकर उपचार किया जाता रहा! दस दिनों के बाद बच्चे की मौत की घोषणा करते हुए यहां के चिकित्सकों ने डेढ़ लाख का बिल थमा दिया। परिजनों को पहले ही संदेह हो चुका था कि उनका बच्चा जीवित है भी कि नहीं? इसीलिए वो बच्चे से मिलना चाह रहे थे किंतु अस्पताल प्रबंधन परिजनों की बच्चे से मुलाकात नहीं करवाता रहा! अंतत: रहस्य खुला। परिजनों ने हंगामा किया। पुलिस आई। आश्वासन मिला और कहा गया कि अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर के विरुद्ध अपराध दर्ज किया जाएगा। दु:खी परिजनों के समक्ष संतुष्ट रहने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था! धरना टला। फिर राज्य सरकार सहित स्वास्थ्य विभाग के मंत्री, सचिव, जिले के स्वास्थ्य अधिकारी, चिकित्सकों पर दृष्टि रखने वाले तमाम संगठन से जुड़े लोगों ने राहत की सांस ली! अब एक मामला टल गया। अब प्रतीक्षा की जाएगी ऐसी किसी और मृतक को जिंदा बताकर लूटने की! 

वास्तव में छत्तीसगढ़ में चाहे वो निजी हो या सरकारी, पूरी की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था भगवान भरोसे ही है। न तो यहां अधिकारियों ने कभी नियम-कानून लागू करवाने का प्रयास किया, न ही ऐसी कोई इच्छाशक्ति कभी सरकार ने दिखाई। जो भी हुआ, कागजों में हुआ। कागजों में नियम बनने लगे। कागजों में ही उसका पालन होने लगा। स्थिति ये है कि निजी अस्पतालों से जुड़े साधारण से नियम को बनाने में सरकार और स्वास्थ्य विभाग के हाथ-पैर फूल जाते हैं। विरोध को झेलने के लिए सरकार के पास इच्छाशक्ति तक नहीं है। संगठित लोग, सरकार को अपने स्टाइल में नचाने का ही काम करते आए हैं। रायपुर के निजी अस्पतालों की बात करें तो भगवान विष्णु के अवतारों के नाम पर नाम रखकर प्रदेश के नामचीन अस्पताल का कथित गौरव पालने वाले अस्पतालों की करतूतें भी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे दो-तीन अस्पताल तो अलग से चिन्हांकित हैं, जो केवल सरकार में बैठे लोगों के संरक्षण में ही फल-फूल रहे हैं। इनके नामों को देखकर अगर कभी कोई निजी व्यक्ति यहां उपचार कराने चला गया तो समझिए कि उसने अपने जीवन भर की कमाई अपने एक बीमारी के उपचार में उड़ा दी! राज्य सरकार ने कुछ साल पहले बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दृष्टिकोण से स्मार्ट कार्ड की सुविधा प्रारंभ की थी। प्रारंभ में इस कार्ड में तीस हजार तक के उपचार की नि:शुल्क सुविधाएं दी गई थी। इस स्मार्ट कार्ड का राजधानी के निजी चिकित्सकों ने कैसे दुरुपयोग किया, ये किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को दीनहीन बनाकर सरकार ही लोगों को निजी चिकित्सालय की ओर ढकेलने का काम कर रही है। हालांकि अब तक ऐसी कोई बात प्रत्यक्ष रुप से सामने नहीं आई किंतु परिस्थितियों को देखते हुए लोग ये पूछने लगे हैं कि क्या सरकार में बैठे लोगों का निजी अस्पतालों में कोई हिस्सा है? प्रदेश के किसी भी सरकारी अस्पताल में चले जाईए, आपका शुरुआत में ही सामना गंदगी और बदबू से होगा। अंदर बैठा स्टॉफ फोन में बतियाता मिलेगा। भीड़ जमा होने पर बड़ी मुश्किल से वो पर्ची काटना प्रारंभ करेगा। लंबी लाइन की स्थिति में ऐसा अक्सर होता है कि जब तक आपकी पर्ची कटती है और आप ओपीडी में पहुंचते हैं, सीनियर डॉक्टर अपनी सीट छोड़ चुके होते हैं। ऐसे में थोड़े बहुत सक्षम लोग भी निजी अस्पतालों की ओर जाना पसंद करने लगे हैं। क्या ये सरकार का फेलियर नहीं है? 

ओम अस्पताल के मामले में एफआईआर विकल्प नहीं हो सकता है। दिल्ली के मैक्स अस्पताल की खबरें जब नेशनल सुर्खियां बन सकती हैं। जब दिल्ली सरकार मैक्स अस्पताल का लाइसेंस छीन सकती है, तब छत्तीसगढ़ सरकार क्या अस्पतालों की अकस्मात जांच का कोई काम नहीं करवा सकती? क्या स्वास्थ्य मंत्री राजधानी में बैठकर बयानबाजी करने तक के लिए सीमित हैं? वास्तव में इन परिस्थितियों में सुधार की संभावना अब दिखती ही नहीं है। तब सरकार कम से कम ऐसा करे कि निजी अस्पतालों के नामों के आगे लगे भगवानों के नाम हटाने का ही आदेश जारी कर दे! इनके नाम लूटमार अस्पताल..., जिंदा नहीं छोड़ेंगे अस्पताल..., कंगाल बनाकर छोड़ेंगे अस्पताल जैसे रखने का आदेश जारी कर दे। ताकि कम से कम अस्पताल में प्रवेश करते समय ही मरीज को वास्तविक स्थिति का भान हो ही जाए!

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