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बस्तर का यही एकमात्र सत्य है!

प्रबल विशेष
भाजपा, बस्तर को लेकर अपनी रणनीति को अंतिम रुप देने जा रही है। पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह 29 दिसंबर से तीन दिनों की क्लास लगाने जा रहे हैं। इन तीन दिनों में वे पार्टी के साधारण कार्यकर्ताओं से लेकर भावी प्रत्याशियों से भी मिलेंगे। पिछले चुनाव में पराजित हो चुके प्रत्याशियों से भी उनकी चर्चा होगी। साल भर पहले हुए प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में बस्तर को साधने के लिए जो नीति बनाई गई थी, गुरुवार की बैठक में उस नीति की समीक्षा होगी। छत्तीसगढ़ में पहले और दूसरे चुनाव में बस्तर ने दिल खोलकर भाजपा का साथ दिया था। स्थिति ये हो गई थी कि जिस बस्तर को कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, उसी बस्तर में कांग्रेस ने मुंह की खाई थी। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ में ये डॉयलाग प्रारंभ हो गया था कि सत्ता का मार्ग बस्तर से होकर जाता है। 2013 के मई महीने में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सली हमला हुआ। इस हमले ने कांग्रेस के अग्रिम पंक्ति के कई प्रमुख नेताओं को मौत के मुंह में सुला दिया था। बस यही से बस्तर देश का ध्यान खींचने लगा। परिणाम ये हुआ कि जिस बस्तर में भाजपा, कांग्रेस को लगभग साफ करते आ रही थी। उसी बस्तर में भाजपा को केवल चार सीटें मिलीं। कांग्रेस ने अप्रत्याशित रुप से यहां 8 सीटों को प्राप्त कर लिया। किंतु कांग्रेस की अपेक्षाएं पूरी न हो सकी। कदाचित भाजपा ने बस्तर का मिजाज पहले ही समझ लिया था। इसीलिए मैदानी क्षेत्रों में अधिक ध्यान देकर पार्टी ने अपनी सरकार बना ही ली। साथ ही ये मिथक भी टूट गया कि सत्ता का मार्ग बस्तर से होकर ही जाता है! इससे पूर्व के दो चुनावों में भाजपा पर केंद्रीय बलों के दुरुपयोग का आरोप लगा। हालांकि इस कालखंड में केंद्र में एक बार कांग्रेस की ही सत्ता रही। कुल जमा, बस्तर का वास्तविक मूड समझने में न तो भाजपा सफल हुई, और न ही कांग्रेस। वास्तव में बस्तर को समझना भी कठिन ही है। जिस बस्तर संभाग के सातों जिले नक्सल प्रभावित हों। जहां अधिकांश लोग आदिवासी हों और जहां के अधिकांश आदिवासी नक्सल और व्यवस्था पीडि़त हों, वहां के लोगों का मूड समझना सरल भी नहीं होगा! फिलहाल इस प्रसंग से परे, बस्तर को अगर राजनीतिक रुप से देखें तो बस्तर की राजनीति पर 2018 में किसका प्रभाव रहेगा, ये समझना भी बस्तर को समझना जितना ही कठिन है। बस्तर के चार भाजपा विधायकों में से दो मंत्री हैं। दोनो के काम करने का तरीका बस्तर के लोगों को नहीं भा रहा है। एक मंत्री केदार कश्यप अपनी राजनीतिक विरासत के कारण इस स्थिति में हैं। आदिवासियों की जनसंख्या को देखते हुए उनके आसपास के लोग उनके भीतर छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाएं पलवाने का काम कर रहे हैं। मंत्री जी भी उसी महत्वाकांक्षा के फेर में हैं। कदाचित यही कारण है कि बस्तर पहुंचते ही मंत्री जी का सुर और बॉडी लैंग्वेज सब बदल जाता है। मुन्नीबाई प्रकरण में उन्होंने अपने प्रभाव का भरपूर उपयोग किया, पर 2018 में उन्हें जनता दरबार में इस प्रश्न का उत्तर देना ही पड़ेगा। दूसरे वन मंत्री महेश गागड़ा हैं। गागड़ा की कार्यशैली खुद पार्टी के कार्यकर्ताओं को नहीं भा रही है। समय-समय पर पार्टी कार्यकर्ता उनके विरोध में पार्टी से पलायन करते ही रहे हैं। ऐसे समय में सौदान सिंह केवल तीन दिनों की बैठक में क्या प्राप्त कर पाएंगे। वैसे, भाजपा से हटकर कांग्रेस के विधायकों की सक्रियता भी जनता के हित में नहीं दिखती है। आदिवासी समाज के कई कांग्रेसी विधायक महंगी गाडिय़ों में धूल उड़ाते घूमते हैं। क्षेत्र के लोग अपनी पीड़ा बताने के लिए सडक़ के किनारे खड़े होकर विधायक जी की गाड़ी से उठा धूल खाकर ‘परिवर्तन’ की ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। संभव है सौदान सिंह कोई गणित लेकर आएं। मतदाता फिर से परिवर्तन के मूड में आए। पर जिस धरती पर वो बसे हैं, समय के साथ

वरदान रुपी वही धरती अब उनके लिए श्राप बन चुकी है! अत्याधुनिक मशीनें उनकी धरती को पातालनुमा बनाने को तैयार है। ऐसे में परिवर्तन का जितना भी खेल हो जाए, एकमात्र सत्य यही है कि आदिवासियों का जीवन परिवर्तित होकर ही रहेगा। समय अवश्य लगेगा, पर यही एकमात्र सत्य है!

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