Skip to main content
Image

पुत्र को हत्यारा बनने से कैसे रोक सकते हैं हम..! प्रबल विशेष 

दुर्ग के प्रतिष्ठित व्यवसायी रावलमल जैन और उनकी पत्नी सूरजी देवी की हत्या से आज पूरा प्रदेश सन्न रह गया। रावलमल व्यवसायी होने के साथ समाजसेवक भी थे। नगपुरा ट्रस्ट के वे प्रमुख ट्रस्टियों में थे। नगपुरा एक ऐसा संस्थान है, जहां हर साल लाखों की संख्या में लोग अपना रोग दूर करते हैं। समग्र समाज के हित में उन्होंने ढेर सारे काम किए। आज उनकी हत्या के बाद लोगों में एक आक्रोश देखने को मिला। साहित्य जगत से लेकर आम लोगों ने भी उनकी हत्या की निंदा करते हुए हत्यारे को जल्द से जल्द पकडऩे के लिए पुलिस पर दबाव बनाते हुए दिखे। इस जघन्य अपराध का सच जब सबके सामने आया तब सारे लोग सन्न रह गए। स्वयं उनके पुत्र ने ही उनकी हत्या की थी। बताया गया कि आरोपी संदीप मुख्य रुप से अय्याश प्रवृति का था। नशे के अतिरिक्त वो कालगर्ल पर भी ढेर सारे पैसे उड़ाया करता था। पिता ने पुत्र को सुधारने की अपेक्षा के साथ कुछ साल पूर्व उसका विवाह भी करवा दिया थाए पर आरोपी का चाल.चरित्र नहीं बदला! रावलमल जी के साथ हुई इस नृशंस घटना के साथ लगभग साल भर पहले ही रायपुर के सुंदरनगर क्षेत्र में दास दंपत्ति की हत्या का स्मरण हो रहा है। दास दंपत्ति की हत्या भी उनके पुत्र ने ही की थी। यहां तो आरोपी ने हत्या के बाद अपने माता.पिता को ही जमीन में गाड़ दिया था। ये चर्चित मामले हैं। आए दिन कोई न कोई ऐसी घटना सुनाई पड़ ही जाती है कि जहां बेटे ने अपने माता.पिता की हत्या कर दी! क्या ये केवल एक पुत्र के द्वारा अपने माता-पिता की हत्या करने जैसा ही मामला है ,क्या ये सामान्य अपराध है! क्या इसका समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है! ये क्या समाज के नैतिक पतन का उदाहरण नहीं है  ये सारे प्रश्न ऐसे हैं, जिन पर विचार करने तक की आवश्यकता हमारे समाज के लोग नहीं कर रहे हैं। घटना हुई। आरोपी पकड़ा गया। पुलिस का काम समाप्त! समाज में दो-चार दिन दिनों तक ऐसे कलयुगी पुत्रों को कोसा जाता है। उसके बाद सब अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं!हमे ऐसा लगता है कि लोग अपने काम में व्यस्त नहीं होते, अपितु ऐसी ही किसी अन्य घटना की अघोषित रुप से प्रतीक्षा में सभी अघोषित रुप से ही व्यस्त हो जाते हैं! क्या लगता है आपको आज हमारा समाज जिस दिशा में जा रहा है, क्या वहां कोई नैतिकता शेष बची हुई है् कदाचित हां!!! क्योंकि ऐसी घटनाओं की संख्या भी कितनी है ऊंगलियों पर गिनी जा सकती है! ऐसे तर्क रखने वाले क्यों भूल जाते हैं कि हर ऐसी घटना केवल घटना नहीं होती। अपितु चकाचौंध में भाग रहे बच्चों को परिवार के श्बंधनश् से मुक्ति दिलाने का मार्ग दिखा देती है। एक अपराधी की मनोवृत्ति से हर वो व्यक्ति प्रभावित होता है जिसकी मनोदशा का प्रारंभ गलत दिशा में होना शुरु हो गया है। कल की ही अपनी विशेष टिप्पणी में हमने समाज को जोडऩे की बात की थी। लोगों से अपनेपन का वो संबंध पुर्नस्थापित करने की अपील की थी जिसे हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया था। समय की मांग कहकर आपने.-हमने हम सभी ने वो मर्यादां तोड़ डाली है। आप अपने बच्चों पर हर समय दृष्टि नहीं रख सकते। परंतु समाज का कोई न कोई व्यक्ति उसे और उसके हर काम को पूरे समय देखता ही है। अगर बच्चों के गलत कामों को अगर उसी समय ही रोक दिया जाए। अगर चाचा-चाची का दायित्व पूरा मोहल्ला उठाने लग जाएए तो ऐसी विकृतियों के विकास को रोका जा सकता है। आमतौर पर होता यही है कि जब हमारा बच्चा हमारे सामने रहता है, तब उसका चरित्र हमे सबसे अच्छा दिखता है। किंतु माता-पिता के थोड़ा दूर जाने के बाद वही बच्चा अपनी वास्तविक मनोवृत्ति में काम करने लग जाता है। उसे इस बात का पूरा विश्वास है कि कॉलोनी के किसी भी व्यक्ति को उससे कोई मतलब नहीं है। अगर कोई उसके माता.पिता से शिकायत करेगा भी तो उसके माता.पिता उसका ही पक्ष लेंगे! गलतियों को बढऩे का अवसर ही मत दीजिए। आज समय बदल चुका है। बड़े होने के बाद या जिम्मेदारी मिलने के बाद बच्चा समझ जाएगाए जैसी सोच आज कितनी घातक हो रही हैए इसके अनेकानेक प्रमाण आपके प्रत्यक्ष हैं। आप अपने बच्चे से प्रेम करते हैं। किंतु प्रेम और अनुशासन के साथ संस्कारों की भी एक सीमा आपको ही बांधनी होगी। अगर आप इसमे सफल हैं तो दूसरों को जागरुक करिए। देखिएगाए धीमे.धीमे हमारा समाज वही मापदंड स्थापित करेगा जिसे हमारे पूर्वज स्थापित करके छोड़ गए थे। अगर अब भी नहीं जागे तो विश्वास रखिए ऐसी घटनाओं की निरंतरता थमने वाली नहीं है!

Add new comment

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Web page addresses and email addresses turn into links automatically.